Monday, July 28, 2008

एक आगोश


एक शाम थोड़ी शरमाई-सीजब इन फिजाओं में बिखर गई,तब याद ही न रहा के कब वो शाममुझे,तेरी आगोश में भर गई।तुम्हारी बाँहों की पनाहों में तोहम, अपनी जिंदगी गुजार देंवो शाम तो बस कुछ लम्हों में गुजर गई।उन लम्हों ने मुझे, एक नया अहशास दिया है,तुम्हारी बाँहों में जिंदगी गुजरेगी ,मुझे ये विश्वाश दिया है।तेरी बाँहों में बिखर केख़ुद को सँवरता देखा,तेरे होंठों को छू केख़ुद को निखरता देखा,तब लगा जैसे पुरी कायनाततेरी बाँहों में सिमट गई,तब याद ही न रहा के कब वो शाममुझे, तेरी आगोश में भर गई,एक शाम थोड़ी शरमाई-सीजब इन फिजाओं में बिखर गई।

1 comment:

Yogendra Singh said...

Very nice poem. When is next one coming?